Friday, 1 February 2013

वो ज़िन्दगी को हमसे कहीं बेहतर समझते हैं ..

वो दुनिया को हमसे कहीं बेहतर समझते हैं ...
तभी अब नाम मेरा अपनी जुबां से दूर रखते हैं ...
वो ज़िन्दगी को हमसे कहीं बेहतर समझते हैं ..
हम तो आज भी इस ज़िन्दगी को उलझन ही कहते हैं ।।
सुना है आ गया है रास दुनिया को मेरा कहना ..
चलो कुछ उनकी सुनते हैं कहीं कुछ हम भी कहते हैं ..
सुना है भूल कर वादे वो अब सुलझे से रहते हैं ...
हम तो आज भी इस ज़िन्दगी को उलझन ही कहते हैं ।।
दौड़ता है जो रग रग में उसे बस खून न कहना ..
तुम्हारे याद के टुकड़े मेरे नस नस में बहते हैं ..
वो साँसों को हमसे कहीं बेहतर समझते हैं ..
जहाँ पे ले मेरी खुशबू वहीँ रास्ता बदलते हैं ।।
वो ज़िन्दगी को हमसे कहीं बेहतर समझते हैं ..
हम तो आज भी इस ज़िन्दगी को उलझन ही कहते हैं ।।

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